Monday, 31 December 2012

चलना है फितरत हमारी

कई चुनौतियां देखीं हमने, आगे की तैयारी है।
हम साथ चले हैं साथ चलेंगे, अगली मंजिल हमारी है।

Thursday, 18 October 2012

कितना मारूं खुद को

 हर बार मिलता हूं मैं उनसे आखिरी समझकर,
लेकिन जज्बात फिर नई मुलाकात करा देते हैं।
हर बार वही ख्वाहिश अधूरी रह जाती है,
मिला था जिसे पूरा करने के लिए पहली बार उनसे।
आज भी उस समां की लौ में उतनी ही गर्मी है,
जितना कि सर्द रातों में इक चिंगारी का होना काफी है।
मेरे जज्बात, मेरे अहसासात अब बर्फ होने को बेताब हैं,
लेकिन तपिश की आंच अभी ठंडी नहीं हुई है।
उस स्टैंड पर अब कोई बस नहीं रुकती है मेरे लिए।
वह दौर और था जब हर बस मुझे अपनी सी लगती थी,
ऊंगली पकड़ कर साथ में सफर कितना जल्दी खत्म हो जाता था,
अब तन्हा मुसाफिर हूं, सफर में मील का पत्थर भी नहीं दिखाई देता।

Wednesday, 22 August 2012

हम हैं अनाड़ी

सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
दुनिया ने कितना समझाया
कौन है अपना कौन पराया
फिर भी दिल की चोट छुपा कर
हमने आपका दिल बहलाया
खुद पे मर मिटने की ये ज़िद थी हमारी 
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
असली नकली चेहरे देखे
दिल पे सौ सौ पहरे देखे
मेरे दुखते दिल से पूछो
क्या क्या ख्वाब सुनहरे देखे
टूटा जिस तारे पे नज़र थी हमारी 
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
दिल का चमन उजड़ते देखा
प्यार का रंग उतरते देखा
हमने हर जीने वाले को
धन दौलत पे मरते देखा
दिल पे मरने वाले मरेंगे भिखारी
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
 
गीतकार- मजरूह सुलतान पुरी 

Tuesday, 14 August 2012

शून्यकाल

 दिख तो सारा आकाश रहा है, उड़ने को उड़ाने हिलोरें मार रही हैं।
 लेकिन वक्त का तकाजा देखिए, जीवन शून्यकाल में चल रहा है।

Tuesday, 5 June 2012

देखेंगे हम भी


चाहत तो अपनी भी है कोई, लेकिन किस्मत अपनी रही नहीं
वो थीं, हैं, रहेंगीं पर अपने मरने की भी तारीख तय नहीं
रहेंगे हम भी रहेंगी वो भी, झेलेंगे मौसम के हर थपेड़े को
देखेंगे  पेड़ किसका सूख गया और  मोहब्बत किसकी हरी रही

Tuesday, 15 May 2012

खबर नवीसों के लिए


दौड़ती- भागती दुनिया में जमाना ब्रेकिंग न्यूज का है,
एक पल तो ठहरो यारों तुम्हें अपने लिए भी जीना है।
जब सुबह की गर्दिश ऐसी है, तो शाम का आलम क्या होगा,
हर हाल में जहां जीना पड़ता है, तो जिंदगी का क्या होगा।

Thursday, 26 April 2012

बस यूं ही.........


अब हम खामोशी की चादर ओढ़ ले, तो कैसा होगा
बोलने में बातें बहुत हो जाती हैं, दूरियों का आभास हो जाता है
मंजिल भी सफर करने लगती है,  और यात्रा पड़ाव पर, बस पहुंचने ही वाली
 होती है कि सफर फिर शुरू हो जाता है

Friday, 6 April 2012

आभासी बाजार, फोन पर खरीदार

दोपहर में फोन आया, क्या आप फ्री हैं? मैंने कहा, जी हां।
सवाल हुआ कि आप एनसीआर में अपना घर लेना चाहते हैं, तो हमारे पास कई साइटें हैं, जो आपको पसंद आएंगी।
फिर शुरू हुआ उन साइटों के प्लाटों का रेट और खूबियां बताने का सिलसिला। सब कुछ अच्छा ही था। प्लाटों में कोई कमी नहीं बताई गई। बताया गया कि इससे सस्ता कहीं मिलेगा नहीं। यह सब जानकारी देने वाली महिला थी। मैंने पूछा कि जिस मकानों
को आप सस्ते में बेच रही हैं। वह बने कहां हैं? जवाब था कुछ ही महीने में तैयार हो जाएंगे। अब एक बड़ा सवाल कौंधा मेरे मन में कि इन बड़े शहरों के बाजार में सब कुछ बिकाऊ है।  हर आभासी चीज इस बाजार में बिकने के लिए तैयार है। बस खरीदार चाहिए। खरीदार नहीं हैं, तो फोन पर ही खरीदार खोजकर सौदा तय कर लीजिए। चाहे खरीदार को बेचने वाले ने देखा भी न हो।
इस बाजार की फितरत देखिए कि हर चीज का मोल लगा देती है। विकास की आड़ में शहरीकरण किया जा रहा है। विकास का पैमान नेशनल हाईवे के दोनों तरफ कुछ किलो मीटर के बाद ही दम तोड़ देता है। फिर भी लोग आभासी बाजार के शोरगुल में माल खरीदने के लिए बेताब हैं और बेचने वाले खरीदारों से कहीं ज्याद उतावले।  अच्छे, मजबूत और टिकाऊ आशियानों को बेचने वाली महिला से जब मैंने कहा कि आप के सभी प्लाटों से ज्यादा खूबसूरत, तो मेरा गांव है। महिला ने बिना सोचे- समझे मुझे निरुत्तर करने के अंदाज में कह दिया कि ‘ऐसा नहीं हो सकता’।
अब उस महिला को कौन बताए कि जिन जमीनों की छाती, आज बड़ी- बड़ी इमारतोें के बोझ से दबी जा रही हैं। वहां पर पहले गांव ही था, खेती थी। लेकिन बाबू  बिकने का  बाजार गर्म है। ‘अब काहें की खेती और काहें का गांव’ देश की जीडीपी बढ़ रही है। जमीनों पर कंकरीट के जंगल उग रहे हैं। अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए भी कुछ करना है। लिहाजा बिना देखी हुई इमारत को फोन पर ही  खरीद लीजिए। पता नहीं बनने के बाद बचे या नहीं।  

मुश्किल में अयोध्या

 बहुत मुश्किल है के हालात की गुत्थी सुलझे, अहले दानिश ने बहुत सोच कर उलझाई है।

बहुत मुमकिन है कि आने वाले कई सालों तक ये लाइनें अयोध्या के हाल पर मौजू हों। 1992 में उठे गुबार की गर्द अब तारीखी हो चुके 6 दिसंबर पर जम जुकी है। साल में एक बार गर्द साफ कर इस तारीख को चमकाने की कोशिशें होती रही हैं। रस्म अब रवायत बन गई है। दोनों ओर से गम और शौर्य की परंपरा ही निभाई जाती है।
 अयोध्या ने अत्याचार और जुल्म के खिलाफ लंका में जाकर लड़ाई लड़ी। अयोध्या पवित्र है जिसका मतलब है कि जहां युद्ध न होता हो। सियासत के दांव-पेंच में फंसी अयोध्या को इस कदर मजबूर कर दिया गया कि कभी लंका से लड़ने वाली अयोध्या को अब खुद से लड़ाई लड़नी पड़ रही है। यह शहर गंगा जमुनी तहजीब के लिए जाना जाता है। दुर्गा पूजा के आखिर दिन जब विर्सजन के लिए दुर्गा प्रतिमाओं की झांकी निकाली जाती है, तो चौक की मस्जिद से मुस्लिम हजरात पुष्प वर्षा करते हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती दुर्गा पूजा के दौरान जब मां के गीतों से शहर के पंडाल गुंजायमान होते हैं, तो अजान के वक्त मुस्लिम इलाकों के दुर्गा पंडालों में लगे लाउड स्पीकर बंद कर दिए जाते हैं। मोहर्रम के दौरान होने वाली मजलियों में हिन्दू और वो भी ब्राम्हण नात पढ़ने के लिए आते हैं।
     इस बार मनाई जा रही विवादित ढांचा ध्वंस की 19वीं  बरसी तक अयोध्या ने हर मायने में करवट बदल ली है। 1992 में सरयू नदी पर सिर्फ एक पुल था। अब तीन पुल हो चुके हैं। व्यापारी बढ़े हैं। कारोबार बढ़ा है। राजनीति में बदलाव आया है। लेकिन इन सब बदलावों के बावजूद रामलला पर लोहे और कंकरीट की दीवार का शिकंजा कसता ही गया है। 67 एकड़ का अधिग्रहित परिसर पूरी तरह से जंगल हो गया है। अजगर और सांप की संख्या बढ़ी है, सुरक्षा कर्मियों में इजाफा हुआ है और राम लला अब पूरी तरह से कैद में आ गए हैं। हिन्दू, मुस्लिम और सियासत की त्रिवेणी में तैरकर सत्ताएं हासिल की गर्इं। सिर्फ और सिर्फ यही कारण था कि भाजपा केंद्र में काबिज हुई। और सिर्फ यही कारण रहा कि केंद्र से भाजपा को बाहर जाना पड़ा। अब हालत ये हो गई है कि भाजपा के गले की फांस बन चुका यह मुद्दा एजेंडे में है या नहीं है बताना मुश्किल हो जाता है। 12 मार्च 2002 को राम जन्म भूमि की ओर से राम कोट मोहल्ले में शिलादान कार्यक्रम किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री को शिला रिसीव करने के लिए राम जन्म भूमि के तत्कालीन अध्यक्ष महंत रामचंद्र दास परमहंस (अब दिवंगत) ने संदेश भेजा। लेकिन वो आ न सके। दुखी परमहंस ने फोन पर कहा, ‘मुझे मंदिर नहीं मिला अटल, तुम्हें कुर्सी मुबारक’। अगस्त 2003 में परमहंस की मृत्यु हो गई। तब अंत्येष्टि में अटल, वैंकेया नायडू, आडवाणी और उमा भारती के साथ सरयू किनारे पहुंचे और फिर से परमहंस के अधूरे सपने(मंदिर निर्माण) को पूरा करने की हुंकार भरी। 2004 में एनडीए ने कार्यकाल भंग कर चुनाव अभियान की घोषणा कर दी और चुनाव प्रचार की शुरुआत अयोध्या-फैजाबाद से की। लेकिन अब तक भाजपा केंद्र की कुर्सी पर नहीं बैठ सकी। 
  आज 19 साल हो चुके हैं। अयोध्या की गुत्थी सुलझी नहीं। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने जो फैसला सुनाया उस पर एक पक्ष की खुशी का ठिकाना ही न रहा लेकिन दुर्भाग्य देखिए जिस फैसले पर वो इतरा रहे थे। उसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देनी पड़ी। हलांकि दूसरे पक्ष के वकील जफरयाब जिलानी की ओर से भी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। लेकिन शुरू से ही वो हाईकोर्ट के फैसले से खुश नहीं थे। हाई कोर्ट के फैसले के बाद देश को लगा कि इस समस्या के समाधान के लिए रास्ता तैयार हो चुका है। लेकिन इस फैसले को आश्चर्यजनक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी और कहा कि जब हिन्दू महासभा, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बंटवारे की मांग नहीं की, तो जमीन के टुकड़े करने का फैसला क्यों सुना दिया गया?  
 एक बहस होती रही है कि अयोध्या का फैसला अदालत करेगी कि खुद ही अयोध्या दहलीज पर कर अपना रास्ता बना लेगी। महंत रामचंद्र दास परमहंस और बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी ने कई बार रास्ता निकालने की पहल की। दोनों की दोस्ती के लिए अयोध्या में कसीदे पढ़े जाते हैं और गाहे-बगाहे मिसालें दी जाती हैं। दोनों जब अदालतों में सुनावई के लिए जाते थे, तो कार परमहंस की होती थी और पेट्रोल हाशिम भरवाया करते थे। साथ बैठकर ताश खेलना आदत में शुमार था। जब परमहंस की मृत्यु हो गई, तो जनाजे पर पहुंचे हाशिम ‘चचा’ से ज्यादा, शायद ही कोई गमगीन हुआ हो। 1967 में किसी ने सोचा भी न होगा कि अयोध्या का यह हाल होगा। इसी साल मनोज कुमार की निर्देशित फिल्म उपकार का गीत है, जो अयोध्या मामले का किस्सा मुख्तसर करने के लिए काफी है--
दुनिया वाले तेरे बनकर तेरा ही दिल तोड़ेंगे,
देते हैं भगवान को धोखा, इंशा को क्या छोड़ेगे
काम अगर ये हिंदू का है, तो मंदिर किसने लूटा है,
मुस्लिम का ये काम अगर है, तो खुदा का घर क्यों टूटा है,
जिस मजहब में जायज है ये वो मजहब ही झूठा है।