Friday, 6 April 2012

आभासी बाजार, फोन पर खरीदार

दोपहर में फोन आया, क्या आप फ्री हैं? मैंने कहा, जी हां।
सवाल हुआ कि आप एनसीआर में अपना घर लेना चाहते हैं, तो हमारे पास कई साइटें हैं, जो आपको पसंद आएंगी।
फिर शुरू हुआ उन साइटों के प्लाटों का रेट और खूबियां बताने का सिलसिला। सब कुछ अच्छा ही था। प्लाटों में कोई कमी नहीं बताई गई। बताया गया कि इससे सस्ता कहीं मिलेगा नहीं। यह सब जानकारी देने वाली महिला थी। मैंने पूछा कि जिस मकानों
को आप सस्ते में बेच रही हैं। वह बने कहां हैं? जवाब था कुछ ही महीने में तैयार हो जाएंगे। अब एक बड़ा सवाल कौंधा मेरे मन में कि इन बड़े शहरों के बाजार में सब कुछ बिकाऊ है।  हर आभासी चीज इस बाजार में बिकने के लिए तैयार है। बस खरीदार चाहिए। खरीदार नहीं हैं, तो फोन पर ही खरीदार खोजकर सौदा तय कर लीजिए। चाहे खरीदार को बेचने वाले ने देखा भी न हो।
इस बाजार की फितरत देखिए कि हर चीज का मोल लगा देती है। विकास की आड़ में शहरीकरण किया जा रहा है। विकास का पैमान नेशनल हाईवे के दोनों तरफ कुछ किलो मीटर के बाद ही दम तोड़ देता है। फिर भी लोग आभासी बाजार के शोरगुल में माल खरीदने के लिए बेताब हैं और बेचने वाले खरीदारों से कहीं ज्याद उतावले।  अच्छे, मजबूत और टिकाऊ आशियानों को बेचने वाली महिला से जब मैंने कहा कि आप के सभी प्लाटों से ज्यादा खूबसूरत, तो मेरा गांव है। महिला ने बिना सोचे- समझे मुझे निरुत्तर करने के अंदाज में कह दिया कि ‘ऐसा नहीं हो सकता’।
अब उस महिला को कौन बताए कि जिन जमीनों की छाती, आज बड़ी- बड़ी इमारतोें के बोझ से दबी जा रही हैं। वहां पर पहले गांव ही था, खेती थी। लेकिन बाबू  बिकने का  बाजार गर्म है। ‘अब काहें की खेती और काहें का गांव’ देश की जीडीपी बढ़ रही है। जमीनों पर कंकरीट के जंगल उग रहे हैं। अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए भी कुछ करना है। लिहाजा बिना देखी हुई इमारत को फोन पर ही  खरीद लीजिए। पता नहीं बनने के बाद बचे या नहीं।  

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