Friday, 19 April 2013

  धड़कते पत्थरों को हमने दिल समझ लिया, फिर अपने दिल को बहलाना सीख लिया।
मेरी चाहत को उसने हवा क्यूं दी थी, जो आसमां में हमने उड़ना सीख लिया।

Sunday, 20 January 2013

सवाल-दर-सवाल : आखिर, कौन कर रहा है ये ‘गुस्ताखियां’

तमाम ‘बंदिशों’ के बाद भी कायम रही श्याम और मंटो की दोस्ती
नई दिल्ली।
 नाटक जब खत्म हुआ, तो कलाकर और कदरदान दोनों की आंखों में आंसू थे। कला और तहजीब की सरहदें नहीं होतीं। भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव है। ठीक इसी वक्त पाकिस्तान से अमन दोस्ती का पैगाम लिए कलाकार भारत पहुंचते हैं। यहां के सरकारी फरमान के बाद अजोका थियेटर के कलाकार पाकिस्तान लौटने की तैयारी कर लेते हैं। लेकिन क्या हुआ ‘कौन है ये गुस्ताख’ का मंचन एनएसडी में नहीं हो पाया। बाबा खड़ग सिंह मार्ग स्थित अक्षरा थियेटर और जेएनयू कैंपस में लाहौर के सआदत हसन मंटो और भारत के श्याम की दोस्ती कायम रही।
  1912 में लुधियाना में जन्मे सआदत हसन मंटो ने सोचा भी नहीं होगा कि भारत-पाक के बंटवारे के बाद जब उनके नाम पर 2013 में भारत में नाटक हो रहा होगा, तो भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव होगा। दुश्मनों क्या पाक कलाकारों तक को भी शक की निगाह से देखा जाने लगेगा। मंटो को पाकिस्तान का प्रेमचंद्र कहा जाता है। उन्होंने दोनों मुल्कों (भारत-पाक) के रिश्तों पर कई कहानियां लिखीं, यह बात और है कि उनको तात्कालिक पाकिस्तानी हुकूमत ने विवादित घोषित कर दिया।
नाटक ‘कौन है ये गुस्ताख’ की निर्देशिका मदीहा गौहर बताती हैं कि नाटक का मंचन जयपुर में होना था, लेकिन दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव के बाद सुरक्षा का हवाला देकर उन्हें दो घंटे के अंदर ही जयपुर से रवाना करा दिया गया। दिल्ली, एनएसडी में भी मंचन होना था। यहां से बहुत उम्मीद थी लेकिन अचानक ही एनएसडी ने भी हाथ खडेÞ कर दिए। लेकिन जिस तरह से अरविंद गौड़ के ‘अस्मिता थिएटर ग्रुप’ और जेएनयू के ‘आइसा’ के सदस्यों ने अपने प्रयासों से इस नाटक का मंचन करवाया, वह काबिल-ए-तारीफ है।
‘कौन है ये गुस्ताख’ में ‘मंटो’ की भूमिका निभाने वाले कामरान मुजाहिद का कहना है कि लाहौर मेहमान नवाजी के लिए जाना जाता है, दिल्ली के हम मेहमान हैं और यहां भी हमारा स्वागत इसी तरह से हुआ जैसे हम लाहौर से रावलपिंडी जाते हैं। दोनों देशों के बीच मौजूदा समय में जो तनाव है, उसको लेकर कलाकारों का मन थोड़ा भरा हुआ है। पाक कलाकार टीपू सुल्तान बताते हैं कि दोनों तरफ ही ऐसी ताकतें हैं, जो अपने को कायम रखने के लिए इस तरह के मुद्दों को तूल देती हैं, बात कोई करना नहीं चाहता सिर्फ ठसक दिखाई जाती है।
नाटक में बंटवारे के बाद दोनों देशों में उपजे हालात को दिखाया गया है, यह भी बताया गया है कि किस तरह से भारत तरक्की के मामले में पाकिस्तान से कहीं आगे निकल गया। लेकिन जब दोनों देशों के बीच मधुर रिश्तों का मुद्दा आता है, तो आज भी दोनों देश 1947 के दौर में ही खडेÞ दिखाई देते हैं। समय-समय पर ऐसी गुस्ताखियां कर दी जाती हैं कि तनातनी फिर बढ़ जाती है। श्याम और मंटो सहित सारे कलाकार लाहौर के लिए रवाना हो गए हैं लेकिन एक सवाल छोड़ गए हैं कि इन गुस्ताखियों के कारण क्या कला और तहजीब की बलि चढ़ानी चाहिए? क्योंकि रिश्तों में सरहदें लांघने की ‘तड़प’ हर समय रहती हैं।

Tuesday, 1 January 2013

इंसाफ का हथौड़ा

  बीते कल से आने वाले  कल का तजुर्बा ले लीजिए,
इस वर्तमान कहीं कुछ बदला हुआ दिखा आपको।
हादसे फिर होंगे,जांच फिर चलेगी, गवाही फिर होगी,
तारीखें चींख-चींख बुलाएंगी और फिर अगली आ जाएगी।
कहते हैं उम्मीद तो है न्याय मिलेगा ही, भरोसा है हमको,
लेकिन अब से तब जाने कितना कुछ ‘नया’ हो चुका होगा।
इस दरमयान जाने कितनी पढ़ियां दुनिया में आ चुकी होंगी,
अदालतों में जाने कितनी फाइलों पर धूल पड़ चुकी होगी।

Monday, 31 December 2012

चलना है फितरत हमारी

कई चुनौतियां देखीं हमने, आगे की तैयारी है।
हम साथ चले हैं साथ चलेंगे, अगली मंजिल हमारी है।

Thursday, 18 October 2012

कितना मारूं खुद को

 हर बार मिलता हूं मैं उनसे आखिरी समझकर,
लेकिन जज्बात फिर नई मुलाकात करा देते हैं।
हर बार वही ख्वाहिश अधूरी रह जाती है,
मिला था जिसे पूरा करने के लिए पहली बार उनसे।
आज भी उस समां की लौ में उतनी ही गर्मी है,
जितना कि सर्द रातों में इक चिंगारी का होना काफी है।
मेरे जज्बात, मेरे अहसासात अब बर्फ होने को बेताब हैं,
लेकिन तपिश की आंच अभी ठंडी नहीं हुई है।
उस स्टैंड पर अब कोई बस नहीं रुकती है मेरे लिए।
वह दौर और था जब हर बस मुझे अपनी सी लगती थी,
ऊंगली पकड़ कर साथ में सफर कितना जल्दी खत्म हो जाता था,
अब तन्हा मुसाफिर हूं, सफर में मील का पत्थर भी नहीं दिखाई देता।

Wednesday, 22 August 2012

हम हैं अनाड़ी

सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
दुनिया ने कितना समझाया
कौन है अपना कौन पराया
फिर भी दिल की चोट छुपा कर
हमने आपका दिल बहलाया
खुद पे मर मिटने की ये ज़िद थी हमारी 
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
असली नकली चेहरे देखे
दिल पे सौ सौ पहरे देखे
मेरे दुखते दिल से पूछो
क्या क्या ख्वाब सुनहरे देखे
टूटा जिस तारे पे नज़र थी हमारी 
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
दिल का चमन उजड़ते देखा
प्यार का रंग उतरते देखा
हमने हर जीने वाले को
धन दौलत पे मरते देखा
दिल पे मरने वाले मरेंगे भिखारी
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी
 
गीतकार- मजरूह सुलतान पुरी 

Tuesday, 14 August 2012

शून्यकाल

 दिख तो सारा आकाश रहा है, उड़ने को उड़ाने हिलोरें मार रही हैं।
 लेकिन वक्त का तकाजा देखिए, जीवन शून्यकाल में चल रहा है।