तमाम ‘बंदिशों’ के बाद भी कायम रही श्याम और मंटो की दोस्ती
नई दिल्ली।
नाटक जब खत्म हुआ, तो कलाकर और कदरदान दोनों की आंखों में आंसू थे। कला और तहजीब की सरहदें नहीं होतीं। भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव है। ठीक इसी वक्त पाकिस्तान से अमन दोस्ती का पैगाम लिए कलाकार भारत पहुंचते हैं। यहां के सरकारी फरमान के बाद अजोका थियेटर के कलाकार पाकिस्तान लौटने की तैयारी कर लेते हैं। लेकिन क्या हुआ ‘कौन है ये गुस्ताख’ का मंचन एनएसडी में नहीं हो पाया। बाबा खड़ग सिंह मार्ग स्थित अक्षरा थियेटर और जेएनयू कैंपस में लाहौर के सआदत हसन मंटो और भारत के श्याम की दोस्ती कायम रही।
1912 में लुधियाना में जन्मे सआदत हसन मंटो ने सोचा भी नहीं होगा कि भारत-पाक के बंटवारे के बाद जब उनके नाम पर 2013 में भारत में नाटक हो रहा होगा, तो भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव होगा। दुश्मनों क्या पाक कलाकारों तक को भी शक की निगाह से देखा जाने लगेगा। मंटो को पाकिस्तान का प्रेमचंद्र कहा जाता है। उन्होंने दोनों मुल्कों (भारत-पाक) के रिश्तों पर कई कहानियां लिखीं, यह बात और है कि उनको तात्कालिक पाकिस्तानी हुकूमत ने विवादित घोषित कर दिया।
नाटक ‘कौन है ये गुस्ताख’ की निर्देशिका मदीहा गौहर बताती हैं कि नाटक का मंचन जयपुर में होना था, लेकिन दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव के बाद सुरक्षा का हवाला देकर उन्हें दो घंटे के अंदर ही जयपुर से रवाना करा दिया गया। दिल्ली, एनएसडी में भी मंचन होना था। यहां से बहुत उम्मीद थी लेकिन अचानक ही एनएसडी ने भी हाथ खडेÞ कर दिए। लेकिन जिस तरह से अरविंद गौड़ के ‘अस्मिता थिएटर ग्रुप’ और जेएनयू के ‘आइसा’ के सदस्यों ने अपने प्रयासों से इस नाटक का मंचन करवाया, वह काबिल-ए-तारीफ है।
‘कौन है ये गुस्ताख’ में ‘मंटो’ की भूमिका निभाने वाले कामरान मुजाहिद का कहना है कि लाहौर मेहमान नवाजी के लिए जाना जाता है, दिल्ली के हम मेहमान हैं और यहां भी हमारा स्वागत इसी तरह से हुआ जैसे हम लाहौर से रावलपिंडी जाते हैं। दोनों देशों के बीच मौजूदा समय में जो तनाव है, उसको लेकर कलाकारों का मन थोड़ा भरा हुआ है। पाक कलाकार टीपू सुल्तान बताते हैं कि दोनों तरफ ही ऐसी ताकतें हैं, जो अपने को कायम रखने के लिए इस तरह के मुद्दों को तूल देती हैं, बात कोई करना नहीं चाहता सिर्फ ठसक दिखाई जाती है।
नाटक में बंटवारे के बाद दोनों देशों में उपजे हालात को दिखाया गया है, यह भी बताया गया है कि किस तरह से भारत तरक्की के मामले में पाकिस्तान से कहीं आगे निकल गया। लेकिन जब दोनों देशों के बीच मधुर रिश्तों का मुद्दा आता है, तो आज भी दोनों देश 1947 के दौर में ही खडेÞ दिखाई देते हैं। समय-समय पर ऐसी गुस्ताखियां कर दी जाती हैं कि तनातनी फिर बढ़ जाती है। श्याम और मंटो सहित सारे कलाकार लाहौर के लिए रवाना हो गए हैं लेकिन एक सवाल छोड़ गए हैं कि इन गुस्ताखियों के कारण क्या कला और तहजीब की बलि चढ़ानी चाहिए? क्योंकि रिश्तों में सरहदें लांघने की ‘तड़प’ हर समय रहती हैं।
नई दिल्ली।
नाटक जब खत्म हुआ, तो कलाकर और कदरदान दोनों की आंखों में आंसू थे। कला और तहजीब की सरहदें नहीं होतीं। भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव है। ठीक इसी वक्त पाकिस्तान से अमन दोस्ती का पैगाम लिए कलाकार भारत पहुंचते हैं। यहां के सरकारी फरमान के बाद अजोका थियेटर के कलाकार पाकिस्तान लौटने की तैयारी कर लेते हैं। लेकिन क्या हुआ ‘कौन है ये गुस्ताख’ का मंचन एनएसडी में नहीं हो पाया। बाबा खड़ग सिंह मार्ग स्थित अक्षरा थियेटर और जेएनयू कैंपस में लाहौर के सआदत हसन मंटो और भारत के श्याम की दोस्ती कायम रही।
1912 में लुधियाना में जन्मे सआदत हसन मंटो ने सोचा भी नहीं होगा कि भारत-पाक के बंटवारे के बाद जब उनके नाम पर 2013 में भारत में नाटक हो रहा होगा, तो भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव होगा। दुश्मनों क्या पाक कलाकारों तक को भी शक की निगाह से देखा जाने लगेगा। मंटो को पाकिस्तान का प्रेमचंद्र कहा जाता है। उन्होंने दोनों मुल्कों (भारत-पाक) के रिश्तों पर कई कहानियां लिखीं, यह बात और है कि उनको तात्कालिक पाकिस्तानी हुकूमत ने विवादित घोषित कर दिया।
नाटक ‘कौन है ये गुस्ताख’ की निर्देशिका मदीहा गौहर बताती हैं कि नाटक का मंचन जयपुर में होना था, लेकिन दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव के बाद सुरक्षा का हवाला देकर उन्हें दो घंटे के अंदर ही जयपुर से रवाना करा दिया गया। दिल्ली, एनएसडी में भी मंचन होना था। यहां से बहुत उम्मीद थी लेकिन अचानक ही एनएसडी ने भी हाथ खडेÞ कर दिए। लेकिन जिस तरह से अरविंद गौड़ के ‘अस्मिता थिएटर ग्रुप’ और जेएनयू के ‘आइसा’ के सदस्यों ने अपने प्रयासों से इस नाटक का मंचन करवाया, वह काबिल-ए-तारीफ है।
‘कौन है ये गुस्ताख’ में ‘मंटो’ की भूमिका निभाने वाले कामरान मुजाहिद का कहना है कि लाहौर मेहमान नवाजी के लिए जाना जाता है, दिल्ली के हम मेहमान हैं और यहां भी हमारा स्वागत इसी तरह से हुआ जैसे हम लाहौर से रावलपिंडी जाते हैं। दोनों देशों के बीच मौजूदा समय में जो तनाव है, उसको लेकर कलाकारों का मन थोड़ा भरा हुआ है। पाक कलाकार टीपू सुल्तान बताते हैं कि दोनों तरफ ही ऐसी ताकतें हैं, जो अपने को कायम रखने के लिए इस तरह के मुद्दों को तूल देती हैं, बात कोई करना नहीं चाहता सिर्फ ठसक दिखाई जाती है।
नाटक में बंटवारे के बाद दोनों देशों में उपजे हालात को दिखाया गया है, यह भी बताया गया है कि किस तरह से भारत तरक्की के मामले में पाकिस्तान से कहीं आगे निकल गया। लेकिन जब दोनों देशों के बीच मधुर रिश्तों का मुद्दा आता है, तो आज भी दोनों देश 1947 के दौर में ही खडेÞ दिखाई देते हैं। समय-समय पर ऐसी गुस्ताखियां कर दी जाती हैं कि तनातनी फिर बढ़ जाती है। श्याम और मंटो सहित सारे कलाकार लाहौर के लिए रवाना हो गए हैं लेकिन एक सवाल छोड़ गए हैं कि इन गुस्ताखियों के कारण क्या कला और तहजीब की बलि चढ़ानी चाहिए? क्योंकि रिश्तों में सरहदें लांघने की ‘तड़प’ हर समय रहती हैं।

No comments:
Post a Comment